जिंदगी तो है बहता झरना/zindagi to hai bahta jharna

जिंदगी तो है बहता झरना


जिंदगी तो है बहता झरना

कितनी सारी जिंदगियाँ मिलती है रोजाना

हर जिंदगी जैसे है किताब का एक पन्ना

पर कहाँ मुनासिब होता है पूरी किताब पढ़ना



कई आरजू, कई जरूरियात, कई आहटे,कई चींखे,

कहाँ कहाँ बिखरी संभव नहीं है खोजना

पढ़ने बैठे तो शायद कम पड़ जाये जीना


तरह तरह के माहौल तरह तरह के लोग

और इन सब में टकरा रहे है सब इंसान

जैसे आफ़तो का उठा हो बवंडर भरा तूफ़ान


कही पर ख़ुशी कही पर गम का सागर

उन सबमें झरने, नदियाँ जैसी छोटी छोटी कहानी

फैली है संसार में जीवन किताब के पन्नो की कई रचना


होता है ताज्जुब हमें, रचनाकार ने भी क्या पढ़ी है रचना ?

अगर पढ़ी होती तो करुणता भरा, भला क्यों किया आलेखन ?


जिंदगी तो है बहता झरना वो तो बहे है निरंतर

अच्छे बुरे अहसास से वो निखरे है निरंतर

शायद यही वजह से ये जिंदगियाँ चले है निरंतर

  Dr.Alpa H Amin
Ahmedabad



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