Nanhe jasoos bhognipur - story

 👉  नन्हे जासूस भोगनीपुर 👇

Nanhe jasoos bhognipur - story


   उन दिनों भोगनीपुर के समाचार पत्रों में ठगी किए उस विचित्र ढंग की खूब चर्चा थी  । ठगी का एक विशेष तरीका अपनाया गया था  ।  एक गिलहरी किसी व्यक्ति के ऊपर चढ़ जाती ,  कोई व्यक्ति गिलहरी को भगाने के बहाने आता और उस आदमी पर से हटाता  ।  जब गिलहरी और से भगाने वाला चले जाते तब जिस पर गिलहरी चढ़ी थी उसे पता लगता कि उसकी जेब कट चुकी है यह पर्स निकल गया है   ।  एक दो बार   यह घटना घटी,  पर किसी ने गिलहरी के चढ़ने और लूटने से कोई संबंध ना जोड़ा    ।   जब चार-पांच बार ऐसी तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति हुईं तो व्यक्तियों का ध्यान इस ओर गया  ।


    उस दिन अखबार पढ़ते पढ़ते विपुल भी इस समाचार को पढ़कर कुछ सोचने लगा   ।  उसने पास बैठे मित्र आशीष को यह समाचार सुनाया और पूछा - `क्या तुम्हें इस घटना में कोई विशेष बात भी लगती है  ?'

     आशीष ने कुछ पल सोचा और कहा- `तुम्हीं ही बताओ कि तुम्हें क्या लगता है  ?'

      विपुल कहने लगा- `मुझे तो लगता है  कि यह गिलहरी फालतू है  ।   किसी ठग ने इसे पाला है ।   मोटा आदमी देखकर वह उसके ऊपर गिलहरी को छोड़ देता है  ।   व्यक्ति का ध्यान गिलहरी की ओर जाता है और दोनों हाथों से गिलहरी को भगाता है  ।    इतनी देर में ठाक अपना काम बना लेता है  ।   गिलहरी पालतू होने के कारण उसी व्यक्ति के पास भागकर छिद जाती होगी    ।'    बिपुल की बात सुनकर आशीष कुर्सी से उछलते हुए बोला- 'वाह भाई वाह  !   क्या खोज की है तुमने भी   ?   जासूस पिता के योग पुत्र बनोगे, प्रशंसा करनी चाहिए तुम्हारी वृद्धि की  ।'


      `पगले हो तुम तो   । अभी प्रशंसा की क्या बात हुई  ?  अभी तो अनुंमान ही लगाया है  । प्रशंसा तो तब होगी जब हम सच्चाई को सामने लाऍं


       `वह तुम पुलिस के लिए छोड़ दो   ।' आशीष कहने लगा  ।

         `पुलिस तो इस विषय में लगता है कि कुछ लापरवाह हैं   । उसे पकड़ना होता तो अब तक पकड़ चुकी होती   । फिर यह ठग अधिक दिनों तक ठगी का यह तरीका न अपनाएगा  । अपने पकड़ें जाने के डर से जल्दी ही यह और दूसरी जगह पर चला जाएगा  ।''  बिपुल बोला ।


     `तुम्हारी बात तो सच लगती है  । आशीष कहने लगा  । 

       बिपुल के पिता खुफिया विभाग में जासूस थे  । जब वह घर आकर अपराधियों को पकड़ने की बातें सुनते तो बिपुल बहुत प्रभावित होता । 

उसका किशोर मन भी वैसा ही करने के उत्साह में से भर उठता  । दो-चार बार उसने इस प्रकार के छोटे-मोटे काम करके पिता की शाबाशी भी पाईं थीं  । बिपुल अब पिता को बिना बताए अचानक कोई बड़ा काम करके उसने बहुत-सी प्रशंसा पाना चाहता था  । उसने आशीष से कहा-`चलो  ! पुलिस से पहले इसको पकड़ने के लिए हम प्रयास करें  !'


    `कैसी बात करते हो, हम क्या कर पाएंगे  ? यह काम तो बड़ों के करने का है  ।'  आशीष कहने लगा   ।   'तो हम क्या बच्चे हैं ? 18 वर्ष के हो चुके हैं  ।  आप अपने आपको गर्व से निहारते हुए विपुल बोला  ।  फिर वह आगे कहने लगा- `आशीष  !  आयु के कम या अधिक होने से कुछ भी नहीं होता  ।   जिसके मन में संकल्प होता है, प्रयास में दृढ़ता होती हैं  वही अपने काम में सफल होता है  ।  साहसपूर्वक किसी कार्य को करने में जुट पढ़ो तो अंत में सफलता ही मिल ही जाती है  ।'

      यह बात बिल्कुल सच है, परन्तु  तुम करोगे भी क्या ?` आशीष बोला । 

       विपुल ने उसे अपनी योजना समझाई और साथ देने के लिए  तैयार कर लिया  ।  उसने कहा कि यदि असफल भी हो जाएं तो क्या हानि है  ।  प्रयास करना हम अपने हाथ की बात है ।  सफलता-असफलता तो बाद की बात है  । 


     विपुल और आशीष दोनों मित्र इस कार्य के लिए तैयार हो गए  ।  माता-पिता या अन्य किसी से उन्होंने कोई चर्चा ना कि   ।  दोनों सुबह ही खा-पीकर, अच्छे कपड़े पहन कर घर से निकल  पड़ते हैं |  उनके हाथ में एक सुंदर-सा बैग रहता, जिसे देखने से लगता कि उनमें उसमें माल होगा  ।  दोनों मित्र भीड़-भाड़ वाले बाजार में घूमते  ।  2 दिन तो दोनों को निराश होना पड़ा ।  तीसरे दिन में और भी अच्छी वेशभूषा में निकले   ।  उन्हें देखकर लगता था कि वे किसी धनी संपन्न परिवार के लड़के हैं  ।  रास्ते में थोड़ी-थोड़ी देर बाद  आशीष जोर-जोर से बिपुल से कहता था-`भाई        ।  बैग जरा संभाल कर रखो  !' 

       एक ठग बहुत देर से उसके पीछे लगा था । वह देख रहा था कि वह बार-बार बैग संभाल रहे हैं और उस पर ध्यान दे रहे हैं ।  `लगता है इसमें कोई कीमती सामान है  ।'  ठग ने मन ही मन में कहा  । फिर वह कोई अच्छा सा मौका देखकर उनका बैग छीनने की योजना बनाने लगा  ।   जय राधा माधव


आशीष और विपुल अभी तिराहे के मोड़ पर पीपल के पेड़ तक ही पहुंचे थे कि एक गिलहरी बिपुल के कंधे पर चड़ गई  । लगता ऐसा था  मानो वह पीपल के पेड़ से कूदी हो ।  दोनों मित्रों अब चौंकन्ने हो गए  ! आशीष दो-चार कदम पीछे हट गया  । विपुल दोनों हाथों से गिलहरी को भगाने लगा  । तभी उस व्यक्ति ने मौका देखकर विपुल के हाथ से बैग झटक लिया और भागने लगा  । गिलहरी भी बिपुल के कंधे से कूदकर उस व्यक्ति के पीछे दौड़ चली ।  परंतु वह व्यक्ति कुछ आगे बढ़े, इससे  पहले ही आशीष और बिपुल ने जाकर उसे कसकर पकड़ लिया  ।  उसने छूटने का बहुत प्रयास किया था परंतु उन दोनों मित्रों की मजबूत पकड़ के सामने उसका प्रयन्त व्यर्थ ही रहा । 

       धीरे-धीरे वहां भीड़ जमा हो गई  । {`गिलहरी चोर'}    पकड़ा गया-  यह खबर जल्दी ही आसपास फैल गई !  व्यक्ति उसे देखने के लिए इकट्ठे होने लगे  । कई व्यक्तियों ने तो उसकी अच्छी खासी पिटाई कर डाली । आशीष और बिपुल ने बड़ी कठिनाई से भीड़ रोका  । भीड़ उस चोर को धकेलती हुई थाने की ओर ले गई   ।

 थाने में बहुत पिटाई होने पर उस ठग ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया । उसने ठगी का प्राय:  वही तरीका अपनाया था जैसा कि बिपुल ने अनुमान लगाया था  । थानेदार ने बिपुल और आशीष कि उनके इस साहस भरे बड़े कार्य के लिए बहुत-बहुत ही प्रशंसा की ।


बिपुल के पिताजी को जब बेटे की बहादुरी का पता लगा  तो वे बड़े प्रसन्न हुए  । उन्होंने इस कार्य के लिए बिपुल से मनचाहा पुरस्कार मांगने की बात कही  ।  विपुल की मां बेटे की इस कार्य से आश्चर्यचकित थी और बेटे की इस साहस भरी बहादुरी पर उन्हें गर्व हो रहा था ।


` नगर किशोर संध्या' की ओर से बिपुल और आशीष का सम्मान किया गया  । जिलाधीश ने उन्हें पुरस्कार दिया और आशा व्यक्त की कि वे भविष्य में भी ऐसे कार्यों से समाज को गौरवान्वित करते रहेंगे  । अपनी सूझबूझ और साहस से किशोर भी यह कार्य कर लेते हैं जिन्हें करना बड़ों के लिए संभव नहीं होता है

 अब यह कहानी यहीं समाप्त होती है आपको कैसी लगी आप लोग कमेंट करके बताइएगा जरूर मित्रों माय नेम इज आशीष यादव ऐ.जे.

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